जानते हो.. तुम्हारी दुनिया
बहुत बड़ी है. तुम्हारी इस दुनिया में तुम्हारे नाते रिश्तेदार है, करियर है, दोस्त
है, तुम्हारे ‘कलीग्स’ हैं.. तुम्हारी उम्मीदें है, तुम्हारे सपने है, तुम्हारी
ख्वाहिशें है, तुम्हारे शौक हैं... और न जाने क्या क्या है..
मेरी बहुत इच्छा होती है कि
मैं तुम्हारी इस दुनिया को अपनी खासियत से या अपनी काबिलियत से या अपनी अहमियत से
नाप सकूं... तुम्हारी ज़िन्दगी में अपने लिए इतना हक़ कमा सकूं, कि जब जी चाहे तब तुम्हारी
इस बड़ी सी दुनिया के किसी भी कोने तक जा सकूं... जब जी चाहे तुम्हारी दुनिया के
किसी भी एक छोर से दूसरे छोर तक जा सकूं..
कितना मुश्किल है ये मेरे
लिए, जानते हो? मैं हर वक़्त यही सोचती रहती हूँ कि इस असंभव को कैसे संभव करू...
कैसे नापूं तुम्हारी दुनिया... कैसे पहुंचूं तुम्हारी दुनिया के उस कोने तक जहां
तुम्हारा दिल है... जानते हो, मैं बहुत बुरी हूँ? मैं तुम्हारी दुनिया के उस दिल
वाले कोने पर अपना कब्ज़ा जमाना चाहती हूँ... मैं चाहती हूँ कि उस कोने पर सिर्फ और
सिर्फ मेरा हक़ हो... सिर्फ मेरा.. खुद तुम्हारा भी नहीं...
तुम्हे पता है, मैं तुम्हारी
दुनिया में खो जाती हूँ. पता नहीं चल पता कि मैंने खुद को किस कोने में छोड़
दिया... फिर भी अकुलाहट नहीं होती.. मालुम जो होता है कि खुद को खोकर भी आखिर
तुम्हारी दुनिया में ही तो हूँ...
फिर भी सोच कर हैरान हो
जाती हूँ कि तुम्हारी इस बड़ी सी दुनिया में जो मैं खो गयी हूँ, क्या पता कभी
तुम्हारे ज़ेहन से भी ओझल न हो जाऊं... बड़ा डर लगता है...तुम ऐसा होने तो नहीं दोगे
न...?
मैं ये नहीं कहती कि अपनी
एक अलग इतनी बड़ी दुनिया रखना गलत है... मुझे बस तुम्हारी इस बड़ी सी दुनिया में खो
जाने से डर लगता है...
और मेरी दुनिया...? मेरी
दुनिया तो बहुत छोटी है... न जाने कितनी छोटी... और मेरी इस छोटी सी दुनिया में
सिर्फ तुम हो... सिर्फ तुम...
मुझे पता है कि जब मैं
तुमसे ये सब बाते कहूँगी तो तुम हलके से मेरे गालों पर एक प्यार भरी थपकी देकर कहोगे, “पगली, क्या क्या सोचती रहती हो..?” और फिर मुझे गले से लगा लोगे.
