Saturday, 31 December 2016

जज़्बात

एक साल और बीता,
देकर कुछ खट्टी-मीठी यादें,
देखते है नया साल,
पूरी करता है कितनी फरियादें...



जानते हो, मुझे सर्दियों से बड़ा डर लगता है. सुना है सर्दियों में सब कुछ जम जाता है. पानी जैम कर बर्फ बन जाता है... खून जम कर सर्द हो जाता है...  मुझे डर लगता है कि कहीं जज़्बात भी जम कर सर्द न पड़ जाते हो... मैं क्या करुँगी अगर तुम्हारे जज़्बात मेरे लिए जम गए तो... डर तो वैसे यूँ भी लगता है जब मुझे महसूस होता है कि तुम्हारे जज़्बात अब मेरे लिए वैसे नहीं रहे जैसे हुआ करते थे... या फिर हो सकता है कि ये सब मेरे मन का वहम हो... हो सकता है कि तुम्हारे जज़्बात मेरे लिए वैसे ही हो जैसे हुआ करते थे... बस तुमने उन्हें जाताना छोड़ दिया हो... या फिर हो सकता है कि अब तुम्हें लगता हो कि जज़्बात ज़ाहिर करने कि या प्यार जताने कि ज़रूरत नहीं रही... लेकिन जानते हो मुझे ये सोच कर भी डर लगता है कि पता नहीं तुम कभी ये सोचते हो कि नहीं कि बिना तुम्हारे जताए या बताये मुझे ये कभी तुम्हारे जज्बातों के बारे में पता नहीं चलेगा... शायद तुम्हें इसकी की भी ज़रूरत महसूस नहीं होती... हो सकता है कि तुम्हें ये बात भी फ़ालतू लगती हो... गैरज़रूरी लगती हो... लेकिन मैं क्या करू... ये मेरे लिए बेहद ज़रूरी है... बेहद ज़रूरी है कि मैं इस बात को लेकर निश्चिन्त रहूँ कि तुम्हारे जज़्बात मुझे लेकर सर्द तो नहीं हुए हैं... ऐसा हुआ तो नहीं है न... बोलो न...!




[चित्र: गूगल से साभार]



Friday, 9 December 2016

हसरतें...


[ चित्र: गूगल से साभार] 



उसने बहुत कुछ सोचा था, अपने लिए, अपनी ज़िन्दगी के लिए... कुछ छिटपुट सी चाहतें थी... कुछ सपने थे... कुछ हसरतें थी... उसके सपनों में एक छोटा सा घर था... एक घर जिसे वह अपना कह सके... उस घर में खुशियाँ थी... मुस्कुराहटें थी... प्यार था... चाहत थी... इज्ज़त थी... कद्र थी...


उसकी चाहतें पूरी भी हुई थी. बहुत कुछ मिला था उसे... लेकिन बहुत कुछ नहीं भी मिला था... उसे तकलीफ भी हुई थी... उसे रोना भी आया था... लेकिन उसने खुद से खुद को खुश रखने का वादा भी किया था... इसलिए वह मुस्कुराई... जब वह मुस्कुराई तो उसे अपनी मुस्कराहट में किसी का अक्स नज़र आया... वह उसका हमसफ़र था... अब उसे मालुम था कि उसकी मुस्कुराहटें किसी की राहतें भी है... अब वह अक्सर मुस्कुराती रहती है... उसकी ज़िन्दगी में अब भी कुछ कमियाँ हैं... लेकिन उसे अब ज़िन्दगी के खुशनुमा पल ज्यादा लुभाते है...

Thursday, 8 December 2016

Desperate Lover





“I am a desperate lover.” She said with a cold but confident voice.

He looked at her and paused for a moment. His slightly widened eyes clearly indicated that he wasn’t ready for such a statement.

“Well, that’s quite a bold statement.” said he leaning forward towards his glass of wine.

“What is it that you consider bold?” she asked without breaking her gaze from his eyes, “Few words of truth or an action of utmost desire?”

His swallowed his breath not knowing what to reply. He was lost in the hypnotic eyes of the lady sitting across the table. Her silver skin was glowing in the light of the candles burning on the little table in his bedroom.

“Does your silence mean an approval of my intentions?” she asked coming close and stopped few inches before his face.


He looked into her mesmerizing eyes and prepared himself to get slayed by her lethal aura… once again…!

Saturday, 16 April 2016

मेरी दुनिया है तुझमे कहीं...

जानते हो.. तुम्हारी दुनिया बहुत बड़ी है. तुम्हारी इस दुनिया में तुम्हारे नाते रिश्तेदार है, करियर है, दोस्त है, तुम्हारे ‘कलीग्स’ हैं.. तुम्हारी उम्मीदें है, तुम्हारे सपने है, तुम्हारी ख्वाहिशें है, तुम्हारे शौक हैं... और न जाने क्या क्या है..
मेरी बहुत इच्छा होती है कि मैं तुम्हारी इस दुनिया को अपनी खासियत से या अपनी काबिलियत से या अपनी अहमियत से नाप सकूं... तुम्हारी ज़िन्दगी में अपने लिए इतना हक़ कमा सकूं, कि जब जी चाहे तब तुम्हारी इस बड़ी सी दुनिया के किसी भी कोने तक जा सकूं... जब जी चाहे तुम्हारी दुनिया के किसी भी एक छोर से दूसरे छोर तक जा सकूं..
कितना मुश्किल है ये मेरे लिए, जानते हो? मैं हर वक़्त यही सोचती रहती हूँ कि इस असंभव को कैसे संभव करू... कैसे नापूं तुम्हारी दुनिया... कैसे पहुंचूं तुम्हारी दुनिया के उस कोने तक जहां तुम्हारा दिल है... जानते हो, मैं बहुत बुरी हूँ? मैं तुम्हारी दुनिया के उस दिल वाले कोने पर अपना कब्ज़ा जमाना चाहती हूँ... मैं चाहती हूँ कि उस कोने पर सिर्फ और सिर्फ मेरा हक़ हो... सिर्फ मेरा.. खुद तुम्हारा भी नहीं...
तुम्हे पता है, मैं तुम्हारी दुनिया में खो जाती हूँ. पता नहीं चल पता कि मैंने खुद को किस कोने में छोड़ दिया... फिर भी अकुलाहट नहीं होती.. मालुम जो होता है कि खुद को खोकर भी आखिर तुम्हारी दुनिया में ही तो हूँ...
फिर भी सोच कर हैरान हो जाती हूँ कि तुम्हारी इस बड़ी सी दुनिया में जो मैं खो गयी हूँ, क्या पता कभी तुम्हारे ज़ेहन से भी ओझल न हो जाऊं... बड़ा डर लगता है...तुम ऐसा होने तो नहीं दोगे न...?
मैं ये नहीं कहती कि अपनी एक अलग इतनी बड़ी दुनिया रखना गलत है... मुझे बस तुम्हारी इस बड़ी सी दुनिया में खो जाने से डर लगता है...
और मेरी दुनिया...? मेरी दुनिया तो बहुत छोटी है... न जाने कितनी छोटी... और मेरी इस छोटी सी दुनिया में सिर्फ तुम हो... सिर्फ तुम...
मुझे पता है कि जब मैं तुमसे ये सब बाते कहूँगी तो तुम हलके से मेरे गालों पर एक प्यार भरी थपकी देकर कहोगे, “पगली, क्या क्या सोचती रहती हो..?” और फिर मुझे गले से लगा लोगे.

और जानते हो.. इसी तरह मेरी पूरी दुनिया तुम्हारी बाहों में सिमट जाती है...


[चित्र : गूगल से साभार]