एक साल और बीता,
देकर कुछ खट्टी-मीठी यादें,
देखते है नया साल,
पूरी करता है कितनी फरियादें...
जानते हो, मुझे सर्दियों से बड़ा डर लगता है. सुना है सर्दियों में सब कुछ जम
जाता है. पानी जैम कर बर्फ बन जाता है... खून जम कर सर्द हो जाता है... मुझे डर लगता है कि कहीं जज़्बात भी जम कर सर्द न
पड़ जाते हो... मैं क्या करुँगी अगर तुम्हारे जज़्बात मेरे लिए जम गए तो... डर तो
वैसे यूँ भी लगता है जब मुझे महसूस होता है कि तुम्हारे जज़्बात अब मेरे लिए वैसे
नहीं रहे जैसे हुआ करते थे... या फिर हो सकता है कि ये सब मेरे मन का वहम हो... हो
सकता है कि तुम्हारे जज़्बात मेरे लिए वैसे ही हो जैसे हुआ करते थे... बस तुमने
उन्हें जाताना छोड़ दिया हो... या फिर हो सकता है कि अब तुम्हें लगता हो कि जज़्बात
ज़ाहिर करने कि या प्यार जताने कि ज़रूरत नहीं रही... लेकिन जानते हो मुझे ये सोच कर
भी डर लगता है कि पता नहीं तुम कभी ये सोचते हो कि नहीं कि बिना तुम्हारे जताए या
बताये मुझे ये कभी तुम्हारे जज्बातों के बारे में पता नहीं चलेगा... शायद तुम्हें
इसकी की भी ज़रूरत महसूस नहीं होती... हो सकता है कि तुम्हें ये बात भी फ़ालतू लगती
हो... गैरज़रूरी लगती हो... लेकिन मैं क्या करू... ये मेरे लिए बेहद ज़रूरी है...
बेहद ज़रूरी है कि मैं इस बात को लेकर निश्चिन्त रहूँ कि तुम्हारे जज़्बात मुझे लेकर
सर्द तो नहीं हुए हैं... ऐसा हुआ तो नहीं है न... बोलो न...!
[चित्र: गूगल से साभार]



